P Sharma
कहा जाता है कि ईश्वर कण-कण में है, पर क्या वह बिना मांगे भी खिलाता है? इस सवाल को परखने के लिए 16वीं सदी के महान संत मलूक दास जी ने एक ऐसी हठ ठानी, जिसने नियति के पहिए को ही घुमा दिया।
प्राप्त कथा के अनुसार, संत मलूक दास जी के मन में एक दिन विचार आया कि यदि ईश्वर सर्वव्यापी है तो क्या वह इस निर्जन जंगल में भी उन्हें ढूंढ लेगा। इसी परीक्षा के लिए वे एक वीरान जंगल में एक ऊंचे बरगद के पेड़ पर जा बैठे और प्रण लिया- “न मैं हाथ हिलाऊंगा, न मुंह खोलूंगा। देखता हूं भगवान कैसे खिलाता है।”
राजा का काफिला और डाकुओं की एंट्री
शाम ढलते ही संत भूख से व्याकुल होने लगे, तभी जंगल में राजा के काफिले का पड़ाव पड़ा। सैनिकों ने सोने-चांदी के बर्तनों में छप्पन भोग सजाया, लेकिन तभी डाकुओं के आने की खबर से पूरा काफिला भोजन छोड़कर भाग निकला। नीचे सुगंधित भोजन सजा था और ऊपर पेड़ पर संत अपनी जिद पर अड़े थे।
इसी बीच हथियारों से लैस खूंखार डाकुओं का गिरोह वहां आ पहुंचा। वीरान जंगल में राजसी भोजन देखकर डाकुओं के सरदार को शक हुआ। सरदार गरजा- “यह जरूर कोई चाल है। इस खाने में जहर मिलाया गया है।”
तलवार की नोक पर मिला ‘प्रसाद’
तभी एक डाकू की नजर बरगद के पेड़ पर छिपे मलूक दास जी पर पड़ी। डाकुओं ने उन्हें नीचे उतारा। संत का चेहरा भूख से पीला पड़ चुका था।
सरदार ने उनकी गर्दन पर तलवार रख दी और दहाड़ा- “ऐ ढोंगी! इस खाने में जहर है न? अब तू ही इसे पहले खाएगा, नहीं तो तेरा सिर धड़ से अलग!”
संत ने तो प्रण लिया था मुंह न खोलने का। उन्होंने मुंह बंद कर लिया। डाकुओं को लगा वह डर रहा है। सरदार ने हुक्म दिया- “इसका मुंह जबरदस्ती खोलो और खाना ठूंसो!”
आदेश मिलते ही दो डाकुओं ने संत के हाथ पकड़े, एक ने जबड़ा खोला और तीसरा बड़े-बड़े ग्रास उनके मुंह में डालने लगा।
और तब छलके आंसू
पेट भरते ही संत की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। उन्होंने आसमान की ओर देखकर मन ही मन कहा- “वाह रे मालिक! क्या गजब का इंतजाम है। मैं हाथ नहीं उठाना चाहता था तो तूने डाकुओं से हाथ पकड़वा दिया। मैं मुंह नहीं खोलना चाहता था तो मौत का डर दिखाकर मुंह खुलवा दिया। तू खिलाता भी है और खिलाने के लिए नौकर भी भेजता है!”
यह दृश्य देख डाकू सहम गए और संत के चरणों में गिर पड़े।
अमर हुआ दोहा
इसी घटना के बाद संत मलूक दास जी ने वह प्रसिद्ध दोहा रचा जो आज भी घर-घर में गूंजता है-
“अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कहि गए, सबके दाता राम॥”
कथा का सार यही है कि कर्म करना हमारा धर्म है, पर कर्म करने की शक्ति देने वाला और फल का दाता केवल वही एक है। जब अहंकार शून्य हो जाता है, तो पूरी सृष्टि उसकी सेवा में लग जाती है।

